की तरफ से संदेश सुधर्मा Sudharma

तुलसी के मत भेद प्रधान अभेद का है। श्रीराम ब्रह्म हैं उनके समान जीव कभी नहीं हो सकता। अतः भेद सत्य है। किन्तु यह भेद अभेद अर्थात् निमित्त और उपादान कारण की एकता का विघात न करके और शरीर-शरीरि-भाव में एकता को भी बनाए रखता है।

"माया बस परिच्छिन्न जड़ कि ईस समान?"
यह जड़ और जीव तो माया के वश होने से परिच्छिन्न हैं, वह कैसे ईश्वर के समान हैं?

श्रीराम का स्वरूप नारायण हैं जिनका पूरा चिदचिद् शरीर है। और राम उसके अन्तर्यामी। जीव भगवान् का अंश है। और माया से कल्पित नहीं, वास्तविक अंश है।

"ईश्वर अंश जीव अबिनासी चेतन अमल सहज सुखरासी।"

सामान्य धारणा में जीव अविद्या से कल्पित है। किन्तु यह तुलसी को न स्वीकार। अविद्या से कल्पित होने पर तो वह सहज सुखरासी न रहेगा। अतः जीव स्वतः सच्चिदानन्द है। और अमल यानि मल/अविद्या से रहित है।

भगवान् राम की दो नित्य शक्तियाँ हैं। विद्या और अविद्या। अधिक विस्तार के भय से वर्णन नहीं कर रहा। विद्या से जीव को मोक्ष और भक्ति मिलती है और अविद्या से वह संसार में रमण करता रहता है। विद्या और अविद्या दोनों ही सत्य हैं और भगवान् की शक्तियाँ हैं, अतः जगत् जैसे जो माया के कार्य हैं वे भी सत्य हैं।

मङ्गल श्लोक में तुलसी कहते हैं "यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः" जिस माया के होने से यह सकल सत्य जगत् भी उस तरह मिथ्या प्रतीत होता है जैसे किसी को रस्सी में सर्प दीखता है।" भगवान् माया से सत्य जगत् भी मिथ्या लगने लगता है।

सङ्क्षेप में कहें तो तुलसीदासजी भक्तिमार्गी आचार्य थे। उन्होंने ज्ञान और कर्म को भक्ति का अङ्ग माना, श्रीराम को पूर्ण शुद्ध साकार ब्रह्म और सकल जड़ जीव को राम के माया के अधीन माना।

जय श्रीराम ।


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